हनुमानाष्टक (श्लोक 3-4)

 हनुमानाष्टक श्लोक 3-4 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक (हनुमानाष्टक):

"बाली की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो।

चौंकि महामुनि साप दियो, तब चाहिए कौन विचार विचारों।।

के द्विज रूप शिवाय महाप्रभु, हो तुम दास के शोक निवारो।

को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।।"

शब्दार्थ:

बाली की त्रास – बाली का अत्याचार

कपीस – वानरों के राजा (सुग्रीव)

बसै गिरि – पर्वत पर रहते थे (ऋष्यमूक पर्वत)

महाप्रभु – श्रीराम

पंथ निहारो – मार्ग की प्रतीक्षा करना

चौंकि – क्योंकि

महामुनि साप दियो – महान मुनि (ऋषि मतंग) ने शाप दिया था

द्विज रूप – ब्राह्मण रूप

शोक निवारो – दुख दूर करना

संकटमोचन नाम तिहारो – तुम्हारा नाम 'संकटमोचन' है

भावार्थ:

बाली के भय से वानरराज सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर छिपकर रहते थे और श्रीराम के आगमन की राह देख रहे थे। बाली वहाँ नहीं जा सकता था क्योंकि उसे महामुनि का शाप था। उस समय प्रभु श्रीराम ब्राह्मण रूप में प्रकट हुए और शोक से ग्रस्त सुग्रीव की सहायता की। हे हनुमान जी! ऐसे प्रभु के सेवक होकर आपने भी दुख दूर किए, इसलिए आपको 'संकटमोचन' कहा जाता है।

विस्तृत विवेचन:

1. सुग्रीव का संकट और हनुमान जी की भूमिका:

इस श्लोक में सुग्रीव पर हुए अन्याय और संकट को उजागर किया गया है। बाली के डर से सुग्रीव पर्वत पर छिपा था। हनुमान जी ही वह माध्यम बने जिनके द्वारा श्रीराम और सुग्रीव का मिलन हुआ। इस मित्रता के कारण ही बाली का अंत हुआ और सुग्रीव का राजपाठ लौटा।

2. ऋषि का शाप और धर्म-संरक्षण का संकेत:

बाली ऋष्यमूक पर्वत नहीं जा सकता था क्योंकि उसे ऋषि मतंग का शाप था—यदि वह उस पर्वत पर जाएगा तो मरेगा। यह दर्शाता है कि धर्म की रक्षा के लिए ब्रह्मतेज (ऋषियों का श्राप) और रामतेज (भगवान की शक्ति) मिलकर अधर्म का अंत करते हैं। हनुमान जी इस कार्य में केंद्र में हैं।

3. हनुमान जी का संकल्प:

श्लोक में “द्विज रूप शिवाय महाप्रभु” पंक्ति बताती है कि श्रीराम ब्राह्मण रूप में आए और हनुमान जी ने उन्हें पहचान लिया। यह उनकी भक्ति, बुद्धि और ईश्वर-दर्शन की क्षमता को दर्शाता है।

4. ‘संकटमोचन’ नाम की पुनः पुष्टि:

अंत में श्लोक दोहराता है कि कौन नहीं जानता कि हनुमान जी संकटमोचन हैं? वे केवल सुग्रीव ही नहीं, समस्त संसार के संकट हरने वाले हैं।

निष्कर्ष:

यह श्लोक हनुमान जी के माध्यम से भगवान श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता, धर्म की स्थापना, और संकट से मुक्ति की कथा को दर्शाता है। हनुमान जी न केवल एक दूत, बल्कि नीति, बुद्धि और सेवा के आदर्श हैं। इसलिए वे ‘संकटमोचन’ कहे जाते हैं—जो न केवल संकट को हरते हैं, बल्कि धर्म-स्थापना में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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