हनुमानाष्टक श्लोक (9-10)
हनुमानाष्टक श्लोक 9-10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक
बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावन मारो।
लै गृह वैद्य सुषेण समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।।
लानि संजीवन हाथ दई, तब लछिमन के तुम प्राण उबारो।
को नहीं जानत है जग में, कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।भावार्थ
जब रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने लक्ष्मण जी के हृदय में बाण मार दिया, तो लक्ष्मण जी मूर्छित होकर मृत्यु-शैया पर पहुँच गए। समस्त वानर सेना और श्रीराम अत्यंत शोकाकुल हो गए।
ऐसे कठिन समय में हनुमान जी ने अपनी बुद्धि, वीरता और पराक्रम का परिचय दिया। वे लंका से वैद्य सुषेण को ले आए, जिन्होंने बताया कि लक्ष्मण जी को बचाने के लिए हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत पर स्थित "संजीवनी बूटी" लानी होगी।
हनुमान जी तुरंत आकाश मार्ग से द्रोणगिरि पर्वत पहुँचे, लेकिन संजीवनी बूटी पहचान नहीं पाए, तो पूरा पर्वत ही उठा लाए। सुषेण वैद्य ने बूटी निकालकर लक्ष्मण जी को दी, जिससे वे पुनः जीवित हो गए।
इस प्रकार, हनुमान जी ने असंभव को संभव कर दिखाया और लक्ष्मण जी को प्राणदान दिया।
इसलिए संपूर्ण जगत जानता है कि "कपि (हनुमान) संकटमोचन" हैं, अर्थात् जो भक्तों के संकट हर लेते हैं।विस्तृत विवेचन
1. परिस्थिति की गंभीरता
यह प्रसंग रामायण युद्ध का अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक क्षण है। लक्ष्मण जी, जो श्रीराम के प्राणों से भी प्रिय हैं, जब मूर्छित हो गए, तो श्रीराम का दुःख और वानर सेना की निराशा चरम पर थी। यह स्थिति दर्शाती है कि संकट चाहे जितना भी बड़ा हो, समाधान भी उसी के अनुरूप होता है।
2. हनुमान जी की भूमिका
हनुमान जी की भूमिका यहाँ संकटमोचक के रूप में है। वे न केवल अपनी शारीरिक शक्ति, अपितु अपनी बुद्धिमत्ता, तत्परता और श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति का परिचय देते हैं।
वे लंका से सुषेण वैद्य को लाते हैं, फिर बिना समय गंवाए द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाते हैं। जब संजीवनी बूटी पहचानने में कठिनाई होती है, तो वे पूरा पर्वत ही उठा लाते हैं। यह उनकी समस्या-समाधान क्षमता और अद्वितीय शक्ति का प्रमाण है।
3. भक्ति और समर्पण का संदेश
हनुमान जी का यह कार्य केवल वीरता नहीं, बल्कि भक्ति और समर्पण का भी उदाहरण है। वे श्रीराम और लक्ष्मण के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यह हमें सिखाता है कि जब भक्ति और सेवा का भाव प्रबल हो, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
4. संकटमोचन स्वरूप
हनुमान जी को "संकटमोचन" कहा गया है, क्योंकि वे न केवल अपने संकटों को दूर करते हैं, बल्कि अपने भक्तों के भी सभी संकट हर लेते हैं।
इस श्लोक में यही भाव है कि संसार में कौन नहीं जानता कि हनुमान जी संकटमोचन हैं।निष्कर्ष
इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि जीवन में जब भी कोई बड़ा संकट आए, तो हनुमान जी की भक्ति, साहस, और संकटमोचन स्वरूप को स्मरण करें।
उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है, और भक्तों के सभी संकट दूर हो जाते हैं।
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