हनुमानाष्टक (श्लोक 1)

 हनुमानाष्टक श्लोक 1 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक (हनुमानाष्टक):

"बाल समय रवि भक्षी लियो, तब तिनहु लोक भयो अंधियारो।

ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहू सो जात न टारों।।"

शब्दार्थ:

बाल समय – बाल्यकाल में

रवि – सूर्य

भक्षी लियो – निगल लिया

तिनहु लोक – तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल)

अंधियारो – अंधकार

त्रास – भय, डर

जग – संसार

संकट – विपत्ति, परेशानी

जात न टारों – कोई भी नहीं टाल सका

भावार्थ:

हनुमान जी ने अपने बचपन में सूर्य देव को खेल-खेल में फल समझकर निगल लिया था। इससे तीनों लोकों में अंधकार छा गया। सूर्य के बिना पूरी सृष्टि संकट में आ गई। उस समय यह संकट कोई भी टाल नहीं सका।

विवेचन (विश्लेषण):

1. हनुमान जी की शक्ति का परिचय

यह श्लोक हनुमान जी की अपार शक्ति को दर्शाता है। बाल्यकाल में ही उन्होंने सूर्य जैसे तेजस्वी ग्रह को निगल लिया, जिससे यह सिद्ध होता है कि वे जन्मजात दिव्य शक्तियों से संपन्न थे।

2. त्रिलोक पर प्रभाव

जब सूर्य अदृश्य हो गया, तो तीनों लोकों में अंधकार छा गया। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह भी है कि हनुमान जी जब कोई कार्य करते हैं, तो उसका असर पूरे ब्रह्मांड पर होता है।

3. संकटमोचक रूप की झलक

इस श्लोक में यह संकेत है कि जब स्वयं ब्रह्मांडीय संकट उत्पन्न हो जाए, तब भी हनुमान जी उसमें निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही गुण उन्हें 'संकटमोचक' बनाता है।

4. अर्थ का गूढ़ संकेत

यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि कोई कार्य, चाहे वह बचपन में ही क्यों न हो, जब महान आत्मा द्वारा किया जाता है, तो उसका प्रभाव व्यापक होता है।

निष्कर्ष:

यह श्लोक हनुमान जी की बाल्यावस्था की लीला के माध्यम से उनके पराक्रम, प्रभाव और संपूर्ण सृष्टि पर नियंत्रण की शक्ति को दर्शाता है। साथ ही यह संकेत देता है कि जब सृष्टि का कोई भी उपाय काम न आए, तब हनुमान जी ही संकट का समाधान करते हैं।

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