हनुमानाष्टक ( श्लोक 2)

 हनुमानाष्टक श्लोक 2 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक (हनुमानाष्टक):

"देवन आनि करी विनती, तब छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।

को नहीं जानत है जग में, कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।"

शब्दार्थ:

देवन – देवताओं ने

आनि करी विनती – आकर विनती की, प्रार्थना की

छाड़ि दियो रवि – सूर्य को छोड़ दिया

कष्ट निवारो – कष्ट दूर किया

को नहीं जानत – कौन नहीं जानता

जग में – संसार में

कपि – वानर (यहाँ हनुमान जी के लिए)

संकटमोचन – संकट को दूर करने वाले

नाम तिहारो – तुम्हारा नाम

भावार्थ:

जब हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया था, तब तीनों लोक अंधकारमय हो गए। उस संकट से बचने के लिए देवताओं ने आकर प्रार्थना की। तब हनुमान जी ने कृपा कर सूर्य को छोड़ दिया और सबका कष्ट दूर किया। इसी कारण से संसार हनुमान जी को "संकटमोचन" के नाम से जानता है।

विवेचन (विश्लेषण):

1. हनुमान जी की करुणा और आज्ञाकारिता:

यह श्लोक केवल शक्ति का नहीं, बल्कि उनके दयालु स्वभाव और देवताओं की बात मानने की प्रवृत्ति को भी दिखाता है। जब देवताओं ने आग्रह किया, तो उन्होंने बिना अहंकार के सूर्य को छोड़ दिया।

2. 'संकटमोचन' नाम की उत्पत्ति:

यह श्लोक हनुमान जी के 'संकटमोचन' नाम को प्रमाणित करता है। जिन्होंने स्वयं संकट पैदा कर, फिर उसे दूर किया—ऐसी शक्ति और नियंत्रण बहुत ही कम में होता है।

3. वैश्विक मान्यता:

श्लोक यह भी बताता है कि हनुमान जी की महिमा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं, अपितु संपूर्ण जगत में उनका संकटमोचक स्वरूप प्रसिद्ध है। "को नहीं जानत है जग में..." से उनका सार्वभौमिक सम्मान झलकता है।

4. न्याय और संतुलन के प्रतीक:

यह भी संकेत मिलता है कि हनुमान जी सिर्फ शक्ति के प्रतीक नहीं, बल्कि संतुलन और न्याय के वाहक हैं। उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग केवल संकट दूर करने के लिए किया।

निष्कर्ष:

यह श्लोक हनुमान जी की महानता, शक्ति, दया और संकट हरने की क्षमता को दर्शाता है। वे केवल शक्तिशाली नहीं, बल्कि करुणामय और लोककल्याणकारी भी हैं। इसीलिए समस्त संसार उन्हें "संकटमोचन" कहकर वंदन करता है।


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